ममत्व भाव का त्याग ही आकिंचन धर्म है: मुनिश्री प्रज्ञा सागर

ममत्व भाव का त्याग ही आकिंचन धर्म है: मुनिश्री प्रज्ञा सागर 
उत्तम आकिंचन धर्म पर विशेष - मुनि प्रज्ञा सागरजी की कलम से 

आर के मार्बल पर 7 शहरों में आयकर विभाग का छापा

आर के मार्बल पर 7 शहरों में आयकर विभाग का छापा 
"इस छोटी सी घटना के लिए मैं अपनी बड़ी तपस्या और गुरुभक्ति नहीं छोड़ सकता " - आचार्यश्री के सानिध्य में गुरु भक्ति में लीन मार्बल किंग अशोक पाटन

अभाव में नहीं, सद्भाव में जीना सीखें: मुनिश्री प्रज्ञा सागर जी

अभाव में नहीं, सद्भाव में जीना सीखें: मुनिश्री प्रज्ञा सागर जी 
उत्तम शौच धर्म पर विशेष - मुनि प्रज्ञा सागरजी की कलम से 


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साधु होना सरल है, सरल होना कठिन: मुनि श्री प्रज्ञा सागर जी

साधु होना सरल है, सरल होना कठिन: मुनि श्री प्रज्ञा सागर जी 

मुझसे किसी जिज्ञासु ने पूछा- मुनि श्री ! धर्म करना सरल है या कठिन है ? मैंने कहा- जिसका

" ‘क्षमा‘ महज दो शब्द नहीं, जीवन की समस्याओं का शाश्वत समाधान है।" - मुनि प्रज्ञा सागर

उत्तम क्षमा धर्म पर विशेष - मुनि प्रज्ञा सागरजी की कलम से 

" ‘क्षमा‘ महज दो शब्द नहीं, जीवन की समस्याओं का शाश्वत समाधान है।" - मुनि प्रज्ञा सागर Read More »

आचार्यश्री का दमोह जिले में मंगल प्रवेश- अनेक स्थानों पर स्वागत द्वार

तेंदूखेड़ा
प्रातः स्मरणीय परम पूज्य संत शिरोमणि आचार्य श्री 108 विद्यासागर जी महाराज जी की सोमवार को आगवानी करने के लिए नगर के अनेक स्थानों  पर जैन समाज के लोगों ने स्वागत द्वारों से सजाया है

जबलपुर - आचार्यश्री विद्यासागर महाराज ससंघ का दयोदय तीर्थ से गमन

जबलपुर 12-जून

आचार्यश्री विद्यासागर  महाराज ने अचानक कल सायं दयोदय तीर्थ  तिलवाराघाट से बायपास की ओर गमन कर लिया । भीषण तपती सड़क पर पैदल चलकर आचार्य संघ सूर्यास्त के पूर्व रास्ते पर आए

बिखरौन-धामनोद में २०० वर्ष प्राचीन मंदिरजी में वेदी प्रतिष्ठा महोत्सव संपन्न

अति पुण्य उदय से धर्मनगरी धामनोद से 2 km दूर ग्राम बिखरौन जिला-धार (मध्यप्रदेश) मे संत शिरोमणि आचार्य श्री १०८ विद्यासागरजी महाराज एवं प पू आचार्य वर्धमान सागरजी महाराज के मंगल आशीर्वाद एवं प प

धर्मप्राण नगरी बडनगर मे आचार्य गुरुवर विशुद्ध सागर जी की हुयी मंगल अगवानी

बडनगर
परम पूज्य आचार्य गुरुवर विशुद्धसागर जी महाराज का आज धर्मप्राण नगरी बडनगर मे मंगल अगवानी हुयी।
जगह जगह मुनि श्री अगवानी मे तोरण द्वार लगे हुये थे, साथ ही समाजजन द्वारा जगह जगह पाद प्र

संयम के जहाज पर होकर सवार, वैभवता का सांसारिक ‘भंवर’ छोड़ बने भव्यरत्न विजय

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